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बस यही है ख़ासियत की कुछ नही है खास मुझ में
हाँ मगर ये जानता हूँ की है बहुत विश्वास मुझ में,
मैं ना सोना मैं ना चाँदी
मैं ना हीरा मैं ना मोती
हूं मगर संतुष्ट कि
हूं किसी आँगन की माटी
मुझसे बनती है वो मूरत, देवता का वास जिसमे
बस यही है ख़ासियत की कुछ नही है ख़ास मुझ में,
लोग मुझ से पूछते हैं
क्या मेरी पहचान जग मे,
मैं ये पूछूँ पाप है क्या
गर रहा अंजान जग मे,
मैं स्वयं का ही पुजारी ना किसी की आस मुझ में
बस यही है ख़ासियत की कुछ नही है खास मुझ में..,








