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सागर


एक वृहद् विशाल
सागर
खारे पानी का,
मचलता है
इन आँखों में
सफ़र करती हैं इनमे
अनसुनी फरियादें
छलक जाना चाहता है
ज्वार, खारे पानी का,
जब्त का भाटा
मगर
खींच ले जाता है
इसे सीमाओं में
और
अब मै रोता भी नहीं..

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