
भागीरथी के पास सब कुछ है
नैराश्य के सिवाय
हिमालय से उतरती गंगा नाजुक विन्यास लिए
गहरे दर्रे,जंगल ,कतारबद्ध हरियाली,
खरामा खरामा हिम मस्तक को जाते ग्लेशियर,
- और-
एन वहीँ नदी के परली तरफ गंगोत्री मंदिर,
कुछ नहीं सुन पता जब मै
तो सुन लेता हु घंटियाँ इसकी
कही नहीं होता जब मै
तो अक्सर यहीं होता हूँ.,
-क्यूंकि-
भागीरथी के पास सब कुछ है
नैराश्य के सिवाय.,
अभिव्यक्ति या प्रतिक्रिया की प्रक्रिया
जब रचती है क्रोध
या अस्वाभाविक अनुभूतियाँ,
-तो-
स्वमेव चल पड़ता हूँ
इस फेनिल प्रवाह में
घुल कर बिखर जाने के लिए,
उसी पल मै भी बन जाता हूँ एक भागीरथी,
स्वप्निल गंगा लिए चला जाता है जो
वसुधा की ओर,
तब मेरे पास भी होता है सब कुछ
नैराश्य के सिवाय,
-क्यूंकि-
भागीरथी के पास सब कुछ होना चाहिए
नैराश्य के सिवाय..







