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सब कुछ




भागीरथी के पास सब कुछ है
नैराश्य के सिवाय
हिमालय से उतरती गंगा नाजुक विन्यास लिए
गहरे दर्रे,जंगल ,कतारबद्ध हरियाली,
खरामा खरामा हिम मस्तक को जाते ग्लेशियर,
- और-
एन वहीँ नदी के परली तरफ गंगोत्री मंदिर,
कुछ नहीं सुन पता जब मै
तो सुन लेता हु घंटियाँ इसकी
कही नहीं होता जब मै
तो अक्सर यहीं होता हूँ.,
-क्यूंकि-
भागीरथी के पास सब कुछ है
नैराश्य के सिवाय.,
अभिव्यक्ति या प्रतिक्रिया की प्रक्रिया
जब रचती है क्रोध
या अस्वाभाविक अनुभूतियाँ,
-तो-
स्वमेव चल पड़ता हूँ
इस फेनिल प्रवाह में
घुल कर बिखर जाने के लिए,
उसी पल मै भी बन जाता हूँ एक भागीरथी,
स्वप्निल गंगा लिए चला जाता है जो
वसुधा की ओर,
तब मेरे पास भी होता है सब कुछ
नैराश्य के सिवाय,
-क्यूंकि-
भागीरथी के पास सब कुछ होना चाहिए
नैराश्य के सिवाय..
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घटना क्रम


अंतर्घट में घटती है
जब जब कोई दुर्घटना
तब तब घटता जाता है
अंतर्घट का जीव घटक,
घटने,न घटने के मध्य में
भ्रमित खडा है एक पथिक
घट ले घटना जी भर के
किन्तु घटे न जीव घटक,
घटनाक्रम से निर्धारित
ऊर घट जाती एक सड़क
उस घट जो चलना चाहो तो
घट लो सब सारे मिथक,
ना कोई लघु पगडण्डी लो
ना जोहो कोई चौराहा
घट घट में जो परम देव है
घट में बस उस को सुमिरो,
तब पाओगे घट बलशाली
तब घटना होगी बंदी
मृत्युघाट से भर विजयघट
लेना तब मंजिल आसंदी ..
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हास,दहेज़,आदम

हास-
अति दुःख से
उपजा था हास,
उर में लत बन
जा बैठा,
अब ,जब जब मै हँसता हूँ
सब कहते हैं "चुप हो जा..,

-दहेज़-
चार भैन म्हारी घरवाली
सासू खूब हँसे है,
ससुरा रोवे, कैवे "चुप री"
अब भी तीन बची सै..,

-आदम-
ठोकर खा कर गिरा कोई
आदम सब हंसने लगे,
एक मगर कोई ऐसा था
जो तब भी खामोश था,
सबने सोचा पागल है
पर ये हास्य-बोध का दोष था..
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पीर


ओ पीर मेरे
हर पीर मेरी
मैं तीर लगा एक काग़ा हूँ
मैं सन्नाटे से बिंधित हूँ
मैं विरहित एक अभागा हूँ

गाँठ न पाया
बंधन कोई
एक टूटा सा धागा हूँ
तेरी आमद पर
आँख लगी
मै प्रथम निशा का जागा हूँ

ओ पीर मेरे
हर पीर मेरी
मैं तीर लगा एक काग़ा हूँ..
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प्रेत



ये मै नहीं
मरी हुई हसरतों का
कोई प्रेत है मुझ में,
जो जलाये रखता है
अतीत की धूनी
अवचेतन में,
तुझे भूलने की प्रक्रिया में
बंद हो जाते है सभी द्वार
चेतना के,
तभी एक झरोखा सा
खोल देता है ये प्रेत
हो कर जिसमे से तेरी यादें
समा जाती है जेहन में,
और इस तरह एक बार फिर
जाया हो जाता है प्रयास
तुझे भूल जाने का.....
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सागर


एक वृहद् विशाल
सागर
खारे पानी का,
मचलता है
इन आँखों में
सफ़र करती हैं इनमे
अनसुनी फरियादें
छलक जाना चाहता है
ज्वार, खारे पानी का,
जब्त का भाटा
मगर
खींच ले जाता है
इसे सीमाओं में
और
अब मै रोता भी नहीं..
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