पीड़ा जब
सब सतहों से
उपर उठ के ललकारे,
यथार्थ तटस्थ हो कर
जब निर्ममता से नकारे,
पश्चाताप के बाद भी
"आत्मग्लानि' ना छंटे/धुले ,
तो? तब क्या?
क्या ये पराजय है?
पराजय तो शायद ना ही हो,
क्यूंकि पराजय तो शब्द ही नहीं!
मेरे नजरिये से ये तो 'अपशब्द' है,
खैर...
पीड़ा के पास तरह-तरह के
शस्त्र हैं प्रहार हेतु,
और मानव के पास
केवल एक कवच है 'हौसले" का,
जो उसे यदा-कदा बचा लेता है,
ये 'पीड़ा" का युद्ध-कौशल नहीं
मानव का हौसला है
जो की 'अपराजित है
और सदा रहेगा, "अपराजित"
1
कल जब सूरज निकले
कल जब सूरज निकले,
फ़ैल जाओ ए नदियों
सम्पूर्ण धरा पर,
तुम भी ओ समीर
धरो अपना प्रचंडतम रूप,
ढहा कर नवीन-प्राचीन
इमारतें सारी,
तहस नहस कर दो सारी सभ्यता
सारी निर्ममता ,
यूँ तो मानवता दिन में भी सोती है
-किन्तु-
आज की रात
ऐसा हो ही जाये तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले
अपनी लालिमा बिखेरे,
तब नभ पर केवल
संगीत हो परिंदों का,
-और-
नीचे नदियाँ ,जिनमे
सुनहरी रंगीन मछलियाँ हों,
जो दिख तो जाएँ ऊपर ही से,
किन्तु उन्हें देखने के लिए
न बचे कोई भी कुत्सित मानव आँख,
प्रकृति , तेरे पुनरागमन हेतु
सौन्दर्य , तेरी स्थापना हेतु,
ऐसा हो ही जाये
तो अच्छा है,
सम्पूर्ण धरा पर,
तुम भी ओ समीर
धरो अपना प्रचंडतम रूप,
ढहा कर नवीन-प्राचीन
इमारतें सारी,
तहस नहस कर दो सारी सभ्यता
सारी निर्ममता ,
यूँ तो मानवता दिन में भी सोती है
-किन्तु-
आज की रात
ऐसा हो ही जाये तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले
अपनी लालिमा बिखेरे,
तब नभ पर केवल
संगीत हो परिंदों का,
-और-
नीचे नदियाँ ,जिनमे
सुनहरी रंगीन मछलियाँ हों,
जो दिख तो जाएँ ऊपर ही से,
किन्तु उन्हें देखने के लिए
न बचे कोई भी कुत्सित मानव आँख,
प्रकृति , तेरे पुनरागमन हेतु
सौन्दर्य , तेरी स्थापना हेतु,
ऐसा हो ही जाये
तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले....,
4
वरण
यम ने नचिकेता को"मृत्यु' का क्या रहस्य बताया,
ये तो अरस्तु ने, न निराला ने समझाया
सुकरात को विष पिलाया गया
मसीह को सूली पर लटकाया गया,
गुजरी बातों में उलझना नहीं चाहता मैं
इन्हें दोहराना भी नहीं चाहता,,
पर मृत्यु-शैया पर लेटा रुग्ण धनकुबेर भी मरता नहीं
दो टुकड़ों में कट चुके इन्सान से भी तुम्हारा मिलन होता नहीं,
जब तक की'मृत्यु" तुम न चाहो
लोग दर्द से रो कर भी,
जर्जर हो कर भी,
तुम्हे क्यूँ नहीं पाते,जब तक कि तुम न चाहो?
तुम्हारा वरण तुम्हारी इजाज़त से ही होता है,
'मौत" क्यूँ नहीं आने देती तुम उन्हें अपने पास
जो पीड़ा में कुछ भी कर के तुम्हे पाना चाहते हैं?
यम या तुम इच्छा-मृत्यु क्यूँ लागू नहीं करते?
मुझे तो इसका कुछ अलग ही राज़ समझ आता है,
'मौत"तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो,
तुमसे वही मिलता है जिसे तुम चाहो
'मौत "तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो,
मैंने दर्द में तुम्हे काफी तलाशा
जतन बाद भी तुम नहीं मिली,
लेकिन ये मेरा वादा है तुमसे की
मै कितना भी जर्जर,रुग्ण, हो जाऊंगा
तुम्हें सोचूंगा भी नहीं,
क्यूंकि 'मृत्यु" एक दिन मुझे तलाशती ,
मेरे वरण हेतु तुम स्वयम आओगी,
और तब मै तुम्हारे साथ तुरत चल पडूंगा,
क्यूंकि
'मौत" तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो.
'मौत" निस्संदेह तुम जीवन से भी ज्यादा खुबसूरत हो ,,
ये तो अरस्तु ने, न निराला ने समझाया
सुकरात को विष पिलाया गया
मसीह को सूली पर लटकाया गया,
गुजरी बातों में उलझना नहीं चाहता मैं
इन्हें दोहराना भी नहीं चाहता,,
पर मृत्यु-शैया पर लेटा रुग्ण धनकुबेर भी मरता नहीं
दो टुकड़ों में कट चुके इन्सान से भी तुम्हारा मिलन होता नहीं,
जब तक की'मृत्यु" तुम न चाहो
लोग दर्द से रो कर भी,
जर्जर हो कर भी,
तुम्हे क्यूँ नहीं पाते,जब तक कि तुम न चाहो?
तुम्हारा वरण तुम्हारी इजाज़त से ही होता है,
'मौत" क्यूँ नहीं आने देती तुम उन्हें अपने पास
जो पीड़ा में कुछ भी कर के तुम्हे पाना चाहते हैं?
यम या तुम इच्छा-मृत्यु क्यूँ लागू नहीं करते?
मुझे तो इसका कुछ अलग ही राज़ समझ आता है,
'मौत"तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो,
तुमसे वही मिलता है जिसे तुम चाहो
'मौत "तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो,
मैंने दर्द में तुम्हे काफी तलाशा
जतन बाद भी तुम नहीं मिली,
लेकिन ये मेरा वादा है तुमसे की
मै कितना भी जर्जर,रुग्ण, हो जाऊंगा
तुम्हें सोचूंगा भी नहीं,
क्यूंकि 'मृत्यु" एक दिन मुझे तलाशती ,
मेरे वरण हेतु तुम स्वयम आओगी,
और तब मै तुम्हारे साथ तुरत चल पडूंगा,
क्यूंकि
'मौत" तुम निस्संदेह जीवन से भी खुबसूरत हो.
'मौत" निस्संदेह तुम जीवन से भी ज्यादा खुबसूरत हो ,,
1
अभिमानिनी
एक बार छला उसने मुझे
तब से अब तक छला ही जा रहा हूँ ,
शायद उसकी नीयत ऐसी नहीं
पर मेरी नियति ऐसी ही है,
किन्तु अब मै कटिबद्ध हूँ
उसे चाहने क लिए नहीं,
उसे खुद को न चाहने देने क लिए
उसके लिए या फिर वो किसी
मायाविनी की तरह अलोप हो जाए,
या स्वयं-सिद्धा का रूप धरे, सामने आ खड़ी हो,
या किसी अभिमानिनी की तरह
बार-बार मेरे ख्वाबों में आ कर
वो ये साबित करे की,
मै अब भी तुम्हारे दिमाग में हूँ,
लेकिन उसे ये जान लेना जरुरी है की
अब वो सिर्फ यदा-कदा नींदों में है,
मेरे जागने पर अब वो नहीं होती,
मै अपनी संकल्प-हीनता जानता हूँ
सो अब मैंने सोना छोड़ दिया है,
सारी रात जागी आँखों से सोचता रहता हूँ की,
अब मै कटिबद्ध हूँ, उसे चाहने के लिए नहीं,
उसे खुद को अब और न चाहने देने के लिए,
किन्तु अभिमानिनी ये तुम भी जानती हो की
मै अपनी संकल्प-हीनता जानता हूँ...,
तब से अब तक छला ही जा रहा हूँ ,
शायद उसकी नीयत ऐसी नहीं
पर मेरी नियति ऐसी ही है,
किन्तु अब मै कटिबद्ध हूँ
उसे चाहने क लिए नहीं,
उसे खुद को न चाहने देने क लिए
उसके लिए या फिर वो किसी
मायाविनी की तरह अलोप हो जाए,
या स्वयं-सिद्धा का रूप धरे, सामने आ खड़ी हो,
या किसी अभिमानिनी की तरह
बार-बार मेरे ख्वाबों में आ कर
वो ये साबित करे की,
मै अब भी तुम्हारे दिमाग में हूँ,
लेकिन उसे ये जान लेना जरुरी है की
अब वो सिर्फ यदा-कदा नींदों में है,
मेरे जागने पर अब वो नहीं होती,
मै अपनी संकल्प-हीनता जानता हूँ
सो अब मैंने सोना छोड़ दिया है,
सारी रात जागी आँखों से सोचता रहता हूँ की,
अब मै कटिबद्ध हूँ, उसे चाहने के लिए नहीं,
उसे खुद को अब और न चाहने देने के लिए,
किन्तु अभिमानिनी ये तुम भी जानती हो की
मै अपनी संकल्प-हीनता जानता हूँ...,
1
गुज़ारिश
सुरमई सबेरे की तरह
मीठी धूप की तरह
स्वप्न-निद्रा की तरह
उड़ते हंसो की कतारों की तरह,
तुम्हारे चेहरे की भंगिमाओ का
बनना-बिगड़ना
मेरी हर बात पर लड़ना-झगड़ना,
प्रेम करना, मुस्कुराना,
मुश्किलों में भी न घबराना,
हर छोटी लकीर तुम बड़ी कर देती थी..,
तुम्हारे अधरों की लकीर
तुम्हारे निगाहों की लकीर
तुम्हारी बाँहों की लकीर
तुम्हारे गीतों के गूंजते सुरों की लकीर,
तुम सब खुबसूरत कर देती थी..,
मुझे याद है तुम मुझे
नई नई परिभाषाएं बताती
सुंदर-असुंदर,आकृति-विकृति,
फिर हमारे बीच एक लम्बी लकीर खिंच गई..
जिसे इस बार तुमने और लम्बा कर दिया...
मुझे याद है तुम्हारा सिखाना
सिखाने का बेहतरीन हुनर ....,
तो अब तुम कहा हो?
जब मै विकृत हो चुका हूँ!
किसी की यादो में गुम हो?
या कोई और तुम्हे याद करता है?
या अब तुमने चेहरा बदल लिया है?
या अकेली हो और मुझे और पिछली
चौदह-१०जनवरी सोचा करती हो?
" मै किसी भी भुलावे में नहीं""
मै जानता हूँ तुम सब" भूल चुकी हो.,
' बस"
एक अंतिम गुज़ारिश है,
ना" मत कहना..,
मुझे भी सिखा दो ना -" सब भूल जाना "
मीठी धूप की तरह
स्वप्न-निद्रा की तरह
उड़ते हंसो की कतारों की तरह,
तुम्हारे चेहरे की भंगिमाओ का
बनना-बिगड़ना
मेरी हर बात पर लड़ना-झगड़ना,
प्रेम करना, मुस्कुराना,
मुश्किलों में भी न घबराना,
हर छोटी लकीर तुम बड़ी कर देती थी..,
तुम्हारे अधरों की लकीर
तुम्हारे निगाहों की लकीर
तुम्हारी बाँहों की लकीर
तुम्हारे गीतों के गूंजते सुरों की लकीर,
तुम सब खुबसूरत कर देती थी..,
मुझे याद है तुम मुझे
नई नई परिभाषाएं बताती
सुंदर-असुंदर,आकृति-विकृति,
फिर हमारे बीच एक लम्बी लकीर खिंच गई..
जिसे इस बार तुमने और लम्बा कर दिया...
मुझे याद है तुम्हारा सिखाना
सिखाने का बेहतरीन हुनर ....,
तो अब तुम कहा हो?
जब मै विकृत हो चुका हूँ!
किसी की यादो में गुम हो?
या कोई और तुम्हे याद करता है?
या अब तुमने चेहरा बदल लिया है?
या अकेली हो और मुझे और पिछली
चौदह-१०जनवरी सोचा करती हो?
" मै किसी भी भुलावे में नहीं""
मै जानता हूँ तुम सब" भूल चुकी हो.,
' बस"
एक अंतिम गुज़ारिश है,
ना" मत कहना..,
मुझे भी सिखा दो ना -" सब भूल जाना "
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