पीड़ा जब
सब सतहों से
उपर उठ के ललकारे,
यथार्थ तटस्थ हो कर
जब निर्ममता से नकारे,
पश्चाताप के बाद भी
"आत्मग्लानि' ना छंटे/धुले ,
तो? तब क्या?
क्या ये पराजय है?
पराजय तो शायद ना ही हो,
क्यूंकि पराजय तो शब्द ही नहीं!
मेरे नजरिये से ये तो 'अपशब्द' है,
खैर...
पीड़ा के पास तरह-तरह के
शस्त्र हैं प्रहार हेतु,
और मानव के पास
केवल एक कवच है 'हौसले" का,
जो उसे यदा-कदा बचा लेता है,
ये 'पीड़ा" का युद्ध-कौशल नहीं
मानव का हौसला है
जो की 'अपराजित है
और सदा रहेगा, "अपराजित"




