कल जब सूरज निकले,
फ़ैल जाओ ए नदियों
सम्पूर्ण धरा पर,
तुम भी ओ समीर
धरो अपना प्रचंडतम रूप,
ढहा कर नवीन-प्राचीन
इमारतें सारी,
तहस नहस कर दो सारी सभ्यता
सारी निर्ममता ,
यूँ तो मानवता दिन में भी सोती है
-किन्तु-
आज की रात
ऐसा हो ही जाये तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले
अपनी लालिमा बिखेरे,
तब नभ पर केवल
संगीत हो परिंदों का,
-और-
नीचे नदियाँ ,जिनमे
सुनहरी रंगीन मछलियाँ हों,
जो दिख तो जाएँ ऊपर ही से,
किन्तु उन्हें देखने के लिए
न बचे कोई भी कुत्सित मानव आँख,
प्रकृति , तेरे पुनरागमन हेतु
सौन्दर्य , तेरी स्थापना हेतु,
ऐसा हो ही जाये
तो अच्छा है,
सम्पूर्ण धरा पर,
तुम भी ओ समीर
धरो अपना प्रचंडतम रूप,
ढहा कर नवीन-प्राचीन
इमारतें सारी,
तहस नहस कर दो सारी सभ्यता
सारी निर्ममता ,
यूँ तो मानवता दिन में भी सोती है
-किन्तु-
आज की रात
ऐसा हो ही जाये तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले
अपनी लालिमा बिखेरे,
तब नभ पर केवल
संगीत हो परिंदों का,
-और-
नीचे नदियाँ ,जिनमे
सुनहरी रंगीन मछलियाँ हों,
जो दिख तो जाएँ ऊपर ही से,
किन्तु उन्हें देखने के लिए
न बचे कोई भी कुत्सित मानव आँख,
प्रकृति , तेरे पुनरागमन हेतु
सौन्दर्य , तेरी स्थापना हेतु,
ऐसा हो ही जाये
तो अच्छा है,
ताकि कल जब सूरज निकले....,






1 comments:
Awesome…karodo logo k udgaar kuch lafzo me bandhne ki badhai,log jo dekh rahe hai mook darshak ban nirmamta ko par pratikriya ki taqat nahi
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